Archive for May, 2011


होठ तो ये खुल गए
आवाज़ मगर कुछ परेशां सी है
तुमने तो ऐसा कुछ न कहा
बस तेरी आवाज़ में ही लफ्ज़ मेरे घुल गए

कहाँ खोजने जाऊं इन्हें मैं
सोच भी तो पाती नहीं
कहना मेरा कुछ वाजिब नहीं अब
सोच भी तेरे लिए है, लफ्ज़ भी तेरे लिए


साहिलों पे बैठ लहरों को गिना करते थे कभी,
आज कश्तियों पे सवार उन लहरों को पार करने चले

वक़्त – वक़्त की बात है, लहरों ने डराया था कभी,
इन लहरों को आज पी गए हम, समंदर दिलों में उतारा है

फिर से कोशिश करो तुम भी डराने की हमें
होंसलों ने हमसे कहा है, उठाना अभी उन्हें और है