Archive for October, 2011


जो सुना, बस वही बनने लगी मैं
उचाईयों पर पहुँचने की चाह में
भुला दिया सागर की गहराईयों को
वो गहराईयों जो मेरा घर थी

आसमानों में उड़ने में मज़ा है, कई बार ये सुना था
सो पंख ढूंडने निकल पड़ी मैं, परवाह नहीं की दिनों की
कई साल बीत गए यूँ
आसमाँ को लेकिन अब भी सागर की सतह से ही देखती हूँ
आज ना उड़ पाई और गहराइयाँ भी अजनबी बनने लगी हैं

क्यूँ ढगा तुमने मुझे यूँ आसमाँ, झूठे वाडे किये सब
आसमाँ चुप था मगर, सागर ने बुलाया पास, बोला वो मुझे तब
खुद ही ढूंडती हो दूसरों में अपने अस्तित्व को
फिर कहो, भला दोष कैसा किसी और का

बोली नहीं मैं, चुप थी, सोचती रही बस यही
क्यों लोग करते हैं आसमानों की बातें
क्या वो भी दूसरों की राहों में अपनी मंजिल ढूंडते हैं
झकजोर दिया तभी लहरों ने और कहा
एक बार सिर्फ अपनी सुनो

आसमाँ को देखा, फिर गहराईयों की राह ली
सोचा एक बार फिर मैं, मैं बन जाऊं