फुरसतें

Posted: June 6, 2012 in Poems
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उन तनहाइयों की गहराईयों में गोते लगाना
और खाली बैठना भी कितना पसंद था मुझे
अब बिना उलझनों की ज़िन्दगी व्यर्थ लगने लगी है
चलते रहो तभी जिंदा होने का एहसास है
तनहाइयाँ भी डराने लगी हैं
के कहीं अकेला समझ, तरस न खाने लगें लोग
कुछ वक़्त लेकिन, आज खाली बैठ कर
खुद के साथ बिताने की ललक फिर से उठी है
भीड़ में घिर के चलते चलते,
अब रुक कर, बस अपने ही साथ
साँसों की आवाजें सुनने के लिए
फिर से टटोलने लगी हूँ उन्ही फुरसतों को
वही फुरसतें जिनमे प्यार हुआ करता था
बिन बातों के भी रात गुज़र जाती थी बातों बातों में

वो आँसू जो सिर्फ आँखों से टपकते थे
नापती नहीं थी हर कदम चलने से पहले
रुक गए हैं कदम अब, जंग लगी है ज़िन्दगी में
आंसुयों ने भी तो आँखों के रास्ते छोड़ कर
घर कर लिया है मेरे ज़हन में
इन आंसुयों को भुला रास्ता दिखाना है मुझे
अपने कदमों पर लगा फीता हटाना है मुझे
फिर से फुरसतों में जीना आज़माना है मुझे

वो पढना किस्से कहानियां, उस दुनिया में खो जाना
किरदारों के साथ रोना, उनकी बातों पे खिलखिलाना
एक बार तो प्यार भी हो गया उससे, ये बोलते भी झिझक जाना
अब कहाँ वो कहानियां है
बस किताबें ही बिखरी पड़ी हैं
लोगों से प्यार करने में मुश्किल हो
तब किरदारों को क्या ज़िन्दगी दें
उन किरदारों से नाता नया जोड़ने को
गालों पे भोली सी सुर्खी बिखरने को
सच पे सपनों के रंग उड़ेलने को
फिर फुरसतों को हकीक़त बनाना चाहती हूँ

दिल और दिमाग में तब कहाँ कोई जंग छिड़ी थी
जिद थी पर कहाँ अपनों से बड़ी थी
सीखें जो खुद को बेहतर करने के लिए थी
आज दूसरों की खामियां गिनवाने में काम आ रही हैं
अध्खुली आँखों में डरे-सहमें से रिश्ते पड़े हैं
प्यार से उन रिश्तों को सहलाने के वास्ते
सोच को कल्पना से गुदगुदाने के वास्ते
खुद से खुद की हर जंग मिटाने के रास्ते तलाशने को
फिर फुरसतें ढूंडने निकली हूँ मैं

पेंसिलों से लकीरें खीचना और मिटा देना
पानियों के बुलबुले हवा में उड़ा देना
छुप-छुप के शरारतों को अंजाम देना
आज कुछ दोस्तों से ही छुप गयी हूँ
अपने चारों तरफ लकीरें खीचने लगी हूँ
गहरी स्याहियों-सी इन सलवटों को पानी में घोलना है मुझे
घर से निकल कर मिट्टियों में खेलना है मुझे
फिर फुरसतों की लज्ज़तों को चखना है मुझे

अंधेरों से, भूतों से डर लगता था
खो जायेंगे कहीं हम ये सोचकर डरते थे
घर के वो छोटे जीव भी डराते बड़ा थे
न घर में अब समय है
चमक ऐसी की अँधेरे भी गुम हो गए हैं
साथ हैं किसी के कहाँ जो खोने से डरे हम
डरना है फिर, के अपनों में फिर घिरना है मुझे
फुरसतों के आँचल में फिर से छुपना है मुझे

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