Archive for August, 2012

फिर बांधो मुझे

Posted: August 29, 2012 in Poems
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अंधेरों की गहराईयों में गोते लगाकर
रोशनियों में तैरना सीखी हूँ मैं
सन्नाटे की गूंज के डर से कानों को कई बार ढका था
उसी गूंज की खिलखिलाहट संग हंसी हूँ मैं

डरी कभी पर डरती नहीं रही मैं
डर-डर के ही तो होंसलों ने बुलंदियां चुनी हैं
बेबसी ने कसा मुझे इतना की दम घुटने लगा था
बस में कर ली बेबसी तो
उसने भी खुला आस्मां तोहफे में दिया था

आज मुझे फिर से बांधो बंधनों में
के आज़ादी का हुनर भूलने लगी हूँ मैं


क्यूँ ना सिर्फ प्यार करूँ तुम्हे इस बार से
टोहने की कोशिशों ने तो अक्सर मुझ को छला है
क्यूँ चाहूँ मैं तुम्हारी खूबियों को
के साथ खामियां दिखें और चुभने लगें

खुश हो जाओंगी अगर तुम में अपना सा कुछ पा कर मैं
दूरियाँ भी तो बढ़ जायेंगी जब पाऊँगी खुद से जुद्दा तुमको मैं

कहाँ मुमकिन है अपना सा कोई मिलना
सभी तो हर किस्सी से जुद्दा हैं
शर्त है एक सा होना अगर प्यार के वास्ते
तो आईने से रूबरू हो
बस खुद से मोहब्बत क्यूँ ना करूँ मैं