Archive for September, 2012

एहसास

Posted: September 22, 2012 in Poems
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एहसास धडकते तो हैं कहीं
क्षण भर को बस दब से गए
कुरेदने से रोते हैं पर
कहते हमसे कुछ भी नहीं
कदमों के रुकते ही सहम जाते
कोई साथ हो तो दीखते नहीं
दूर से देख कर ही अब सुकून पाते हैं
कहते हैं छुना न मुझे

पर हर बार बिखरने को आतुर,
बेख़ौफ़ दर्द से, रुसवाइयों से
बंधनों को तोड़ने में सक्षम
जीवन को मझधार में छोड़ने को
तैयार फिर से सपने बटोरने को

ये धरती मेरी भी है

Posted: September 16, 2012 in Poems
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सरहदें ना बाँट की इंसानियत को
तो कैसे बाँटती शैतानों को
दूर देश से आये हैं कहकर
हमने भारत उनसे आज़ाद किया
वो जब राज करते थे हम पर
हम में से कुछ रोते और बिलखते थे

वो जो दूर देश से आये थे
हम से कुछ फर्क दीखते थे
शायद इतने निर्मम हैं ये
क्यूँ की हमसे अलग हैं ये
ऐसा सोचा हमने और उनका बहिष्कार किया
सत्ता सौप दी उन हाथों में
रंग से जिनका हमसे मेल हुआ

रंग एक है, देश वही है
फिर क्यूँ ये हाहाकार मचा
सब अपने से हैं, है देश भी ये अपना सा
फिर क्यूँ अपने ही घर से
बाहर निकलना दुष्वार हुआ

रंग-रूप या मिटटी की खुशबु,
ये सब एक भुलेका है
शोषक से कोई मेल अगर है तेरा
तो क्यूँ तेरी पीड़ा से उसने मुख फेरा है
बस रंग बदलने से उसके
क्यूँ तुने ये रण छोड़ा है
आवाज़ उठा फिर, शौर्य बढ़ा फिर
बस इतना ही तो उससे कहना है
ये धरती मेरी भी है
यहाँ मेरा भी तो बसेरा है
चुप रह कर अपने काम करूँ मैं लेकिन
मुझे किसी से दब कर नहीं रहना है

नफरत का बहाना

Posted: September 16, 2012 in Poems
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क्या ऐसा बस एक बार हुआ है
जब अपना अस्तित्व ही दाव लगाया है
जान कर न सही, अनजाने में ही
क्या नहीं मैंने अपना ह्रदय दुखाया है
कहाँ कोई है, जिसने मुझ से ज्यादा
मुझको यूँ सताया है

क्या खुद से रूठी बैठी हूँ मैं, इन सारी बातों से
फिर क्यूँ तेरी छोटी सी चूक का करूँ बहाना
तुझसे नफरत करने को

बातों-बातों में

Posted: September 2, 2012 in Poems
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बातों-बातों में सभी शब्द बिखर गए
पहले कोई सोच थी ना ख्याल था
बोलना है जब से सीखा, कई “शायद” ज़िन्दगी से जुड़ गए
इन शायदों को क्या कोई है जो कुछ देर बहला सके
सब से नहीं, न सही, बस मेरी खुद से पहचान करा सके
मैं चुप रहना फिर से सीख लूँ, बस इतना वक़्त उधार दे

प्यार की अभिलाषा

Posted: September 1, 2012 in Poems
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कितना शोर है
सिर्फ बातें ही बातें हैं
एक तरफ है प्यार की अभिलाषा
और हर तरफ प्यार की परिभाषा
समझा कुछ हमने जब तक
ये परिभाषाऐ बदल गयीं

शब्द तोड़ दो, एहसासों को बसना है दिल में
जगह बना दो, अर्थ धूमिल कर दो सारे
कहाँ हैं वो शब्द जो बता पाते कुछ
जब भी बोले अधुरा-कृत्रिम ही बोले
एहसासों की गहराइयाँ तो मन की खामोशी ही खोले
सोच-समझ में अभिलाशयों ने तो दम तोडा है
आज जिला दो, एहसासों की सान्जिविनी थोड़ी इन्हें भी चखा दो