ये धरती मेरी भी है

Posted: September 16, 2012 in Poems
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सरहदें ना बाँट की इंसानियत को
तो कैसे बाँटती शैतानों को
दूर देश से आये हैं कहकर
हमने भारत उनसे आज़ाद किया
वो जब राज करते थे हम पर
हम में से कुछ रोते और बिलखते थे

वो जो दूर देश से आये थे
हम से कुछ फर्क दीखते थे
शायद इतने निर्मम हैं ये
क्यूँ की हमसे अलग हैं ये
ऐसा सोचा हमने और उनका बहिष्कार किया
सत्ता सौप दी उन हाथों में
रंग से जिनका हमसे मेल हुआ

रंग एक है, देश वही है
फिर क्यूँ ये हाहाकार मचा
सब अपने से हैं, है देश भी ये अपना सा
फिर क्यूँ अपने ही घर से
बाहर निकलना दुष्वार हुआ

रंग-रूप या मिटटी की खुशबु,
ये सब एक भुलेका है
शोषक से कोई मेल अगर है तेरा
तो क्यूँ तेरी पीड़ा से उसने मुख फेरा है
बस रंग बदलने से उसके
क्यूँ तुने ये रण छोड़ा है
आवाज़ उठा फिर, शौर्य बढ़ा फिर
बस इतना ही तो उससे कहना है
ये धरती मेरी भी है
यहाँ मेरा भी तो बसेरा है
चुप रह कर अपने काम करूँ मैं लेकिन
मुझे किसी से दब कर नहीं रहना है

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