Archive for December, 2012

गुनहगार

Posted: December 20, 2012 in Poems
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तेरे लिए जो शिकार है
देख, वो तुझसे शर्मसार है
इक नज़र उठा के देख ले
तू ना फिर कभी नज़र उठाएगा
माना सुला रखा है तूने रूह को
फिर भी बहुत पछतायेगा

क्या सज़ा तुझे मुहैया करूँ
अकेला तू कहाँ गुनहगार है
टुकड़ों में जब ये ज़ुल्म था
छुप कर जब था हो रहा
मैं भी तो तब चुप रहा
मैं भी तो ये किस्सा था बस पढ़ रहा
आज जब बर्बर हुआ
तो कोफ़्त है, हाहाकार है
गुस्सा भी टुकड़ों ही में बंट गया
अब तो बस हम बिलख रहे
नहीं जानते क्या करें
बातों में भी तो कुछ रखा नहीं

क्या जानता है तूने क्या किया
इंसानों में ही देख तूने
इंसानियत का खौफ उतार दिया
उसका जो हुआ खौफनाक था
तूने खुद को भी तो हैवान बना लिया
हम सब में था जो छुपा हुआ
उस शैतान को खुद में बसा लिया

ना रहम की तू उम्मीद कर
वो तूने ही तो क़त्ल कर दिया
ना कद्र तू उसकी कर सका
ज़िन्दगी तूने जब दफ़्न की
तडपती रही होगी वो
जब बिलखना उसका सिसकी बना
सिसकियाँ भी तूने घोंट दी
सांस मौत करके छुप गया
ढूंडा है जब तुझे लोगों ने
तू आज सज़ा भी पायेगा
दरिन्दगी ने देख तेरी
हर इंसान को वहशी बना दिया

क्या कहूं मैं तेरी दलील में, देखती हूँ बस यही
कल एक बार फिर से आएगा
जब भूल कर तुझे सभी, किस्सा नया उठाएंगे
उंगलियाँ उठेंगी फिर, लेकिन गुनाहगार बदल जायेगा
हर नयी सुबह को पहली काली रात मिटायेंगे

कहाँ है वो ज़िन्दगी जिसको तूने मौत दी
मिलने को उस ज़िन्दगी से, है चाह पर दिल है कुछ बेज़ार भी
क्या कोई उसको अब सहलाता है या वो बनी मज़ार है
तुझको सज़ा देने में उसको ही मैंने भुला दिया
खौफ जो तूने दिए उनको अब मिटाना है

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वो पूछते हैं, क्यूँ इधर-उधर तू भटक रहा
ये जो रास्ते हैं बने हुए, क्यूँ नहीं तू इन पर चल रहा

ये जो रास्ते हैं, मैं देखता हूँ जब उस तरफ
शुरू हुए अंत होने के लिए, हर तरफ इनके छोर है
भटक रहा हूँ तेरी आस में, शायद भटकता ही जाऊं मैं
किन्तु इन रास्तों पर चल कर, एक जो आस है, वो भी गवाऊंगा

रिश्ते

Posted: December 1, 2012 in Poems
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साथ है बस अपने तू, बाकि सब तो भ्रम है
अपना भी न हो पायेगा, तू इन रिश्तों की खोज में
रिश्ते ही वो तिलस्म हैं, ढेलते खुद से दूर जो

नहीं कहता तुझसे न प्यार कर, कर तू बेशुमार कर
प्यार को क्यूँ मगर, बांधता रिश्तों की ज़ंजीर से
रिश्ते निबाह करने को, तू प्यार की ही बलि चढ़ाएगा
कौन है संग तेरे, देख न पीछे मुड़-मुड़ के तू
साथ खुद से छुटेगा और अकेला ही ठोकरें खायेगा
रिश्ता खुद से जोड़कर, सब को संग अपने पायेगा