रिश्ते

Posted: December 1, 2012 in Poems
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साथ है बस अपने तू, बाकि सब तो भ्रम है
अपना भी न हो पायेगा, तू इन रिश्तों की खोज में
रिश्ते ही वो तिलस्म हैं, ढेलते खुद से दूर जो

नहीं कहता तुझसे न प्यार कर, कर तू बेशुमार कर
प्यार को क्यूँ मगर, बांधता रिश्तों की ज़ंजीर से
रिश्ते निबाह करने को, तू प्यार की ही बलि चढ़ाएगा
कौन है संग तेरे, देख न पीछे मुड़-मुड़ के तू
साथ खुद से छुटेगा और अकेला ही ठोकरें खायेगा
रिश्ता खुद से जोड़कर, सब को संग अपने पायेगा

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