सच और शिकायतें

Posted: April 11, 2013 in Poems
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1) रात है, चिराग सारे बुझा दो
सच मेरे, रोशनियों से झिझकते हैं

2) रूबरू हैं तेरे, सच तो न बोल पाएँगे
क्या कहे ऐसा तुझे, के झूठ भी ना लगे

3) सच ही तो है, सच भी भ्रम है
कई कहानियाँ ख़ुद पर आज भी यकीन कराती हैं

4) आज ख़ुद कि ही शिकायत की है मैंने
सज़ा चाहती हूँ कि चैन मिले

5) आज किस-किस की शिकायत करूँ
के हर शिकायत कि मुजरिम मैं ही हूँ

6) महफिल में तो सब के बीच रहने दो हमें
जज़्बातो में बह कर सबको रुसवा कर जाएँगे

7) कोई तो समझाओ मुझे चुप रहने को
यूँ दिल कि बातें सरेआम बताते नहीं हैं

8) आँखों पे तो परदे गिरा दें, जुबां भी दगाबाज़ नहीं
ये दिल ही है जो जज्बातों को लगाम नहीं देता

9) कहाँ कोई चाहिए ज़ख्मों को सहलाने को
चंद आंसू दे बस कोई मेरे ज़ख्मों पे बहाने को

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Comments
  1. anurag says:

    आज अचानक ही आपका लिंक पेज क्लिक किया तो दिल का चिराग रोशन हो उठा! बहुत उम्दा लेखन है आपका! इतना आकर्षक है कि लगातार पढ़ने का मन हो रहा है!

    • Rijuta says:

      शुक्रिया 🙂

      Only your first name is appearing so I am not able to make out if I know you. But what you wrote says that we are acquainted otherwise also. So, if you may let me know, my curiosity will rest in peace!!!

      • anurag says:

        Thanks for your quick response. I am happy to know that you feel acquainted (otherwise). aap hee ke शब्द दोहराना चाहता हूँ :
        रूबरू हैं तेरे, सच तो न बोल पाएँगे
        क्या कहे ऐसा तुझे, के झूठ भी ना लगे!
        वैसे हमारी वाकफियत इससे पहले नहीं है यह तो निश्चित है! मैंने आपकी रचना पहली बार ही पढी है और इतनी संवेदनशील अभिव्यक्ति वह भी इतने सरल शब्दों में साधारणतया कम ही मिलती है! सभी के लेखन में लेखक या कवि/कवियत्री क्या कहना चाह रहा/रही है यह जानने के लिए कोशिश करनी पड़ती है पर आपको पढने के लिए केवल आँखों की जरूरत है क्योंकि पढ़ते ही सीधे दिल में पहुँच ही जाता है जो आप कहना चाहती हैं – दिमाग को कष्ट देने की जरूरत नहीं पड़ती!

        आपकी जानकारी के लिए – मुझे – अनुराग चन्द्र शर्मा कहा जाता है!

        • Rijuta says:

          Your appreciation are very generous. Your saying that “…इतनी संवेदनशील अभिव्यक्ति वह भी इतने सरल शब्दों में साधारणतया कम ही मिलती है!” means a lot.
          ज्ञान की सिमिता भावनाओं के आड़े नहीं आती, ये यकीं होता है 🙂

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