Archive for May, 2013


क्यूँ खोजते हो आंसुओ में, मेरे गम के सबूत
नब्ज चलती हैं जब, आंखे छलकेंगी ज़रूर

ख्वाइशों में भटके तो राम को भूले और सपने सजोना भी भूल गए
इबादत और सपनों के व्यापार में हंसी-ख़ुशी का मोल ऐसा मिला
अपने से दूर हुए और अजनबियों का दिल बहलाते रहे

ग़मों को अपने सींच कर, तूने ऐसा बड़ा किया
के खुली आंखों से भी तुझे, दुनिया बेपरवाह लगे

ख़ुशी ज़ाहिर होती है कभी, कभी गम बाँट लेती हूँ
और कुछ नहीं होता तो, खुद पे ही थोडा हंस लेती हूँ

आप का जवाब नहीं
भीड़ भी चाहिए
और तन्हाई का दावा भी

दर्द के नाम पर दोस्ती मत करना
दर्द के रिश्तें अक्सर दर्द देते हैं

एक छत देकर तुमने एहसान तले दबा दिया
और मुझसे मेरा आसमाँ भी चुरा लिया

मैखाने का दस्तूर है शायद
बुरा-बुरा बोल कर पिए जा रहे हो
पिए जा रहे हो, जिए जा रहे हो

एक छत देकर तुमने एहसान तले दबा दिया
और मुझसे मेरा आसमाँ भी चुरा लिया

एक वक़्त था, आँखें भी पढ़ा करते थे
वक़्त बदला और देखा, नज़रें भी कहाँ एक सी रहती हैं

अजब सी दुनिया में गजब से हम
हर कदम, हम-कदम, दुनिया के नए रंग

दिल का क्या है, टूटता है
फिर हो जाता है तैयार टूटने को

एक बार इबादत होने दे, सर खुद-ब-खुद झुक जायेगा
मुहब्बत दस्तूर देखे तो मुहब्बत नहीं, बस वहम है


दर्द था दिल का, जो तुमसे बाँटा था
अफसाना बना कर, तुमने उसे मश्हूर किया

कई कहानियाँ, जो तुमने दी थीं मुझे
कौन सी मेरी है, हो सके तो बताना

यूँ मेरा नाम भी पूछोगें तो भूल जायेंगे
और तुम कहते हो के दिल की बात करते हैं

दिल की बातों का ज़िक्र क्या करना
चलो एक किस्सा तुम्हे दिलचस्प सुनाते हैं

मेरे दर्द का किस्सा बना कर, दुनिया में सुनाते हो
दूर जाकर, दूरियों का इलज़ाम फिर मुझ पर लगते हो

ये मुहब्बत है या खंजर है
हर बात पे उसका खौफ दिखाते हो

मुहब्बत के नाम पर दर्द लिखते हो
वो इलज़ाम सहे, फिर उससे नफरत भी करते हो

दुनिया को भी साथ कर लिया अपने
हम तो अब तनहा ही इंतज़ार करते हैं

आप का जवाब नहीं
भीड़ भी चाहिए
और तन्हाई का दावा भी

रात और तारे

Posted: May 20, 2013 in Poems
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वो तारे भी कभी पत्थर हुआ करते थे
चमकते हैं तभी से, रात से जब इश्क हुआ

रात का काजल
आँखों में सजा कर
तारे जब पलकें झपकते हैं
आसमाँ झिलमिलाता है

रात के अंधेरों ने ही, झिलमिलाते तारों को खुशनुमा बनाया है
क्यूँ दरारें डालने की ज़िद्द है तुम्हारी, इन प्यार करने वालों में

यहाँ तो रात भी नहीं
तारों को बुलाएँ कैसे
दिन के उजालों में बस
कागज़ पे नक़्शे पढ़ा करते हैं

रात के तारे हैं या तारों की है रात
दोनों हसीन, जब हों एक दुसरे के साथ