फुरसतें

Posted: July 20, 2013 in Uncategorized

Prevalent yet Unseen

उन तनहाइयों की गहराईयों में गोते लगाना
और खाली बैठना भी कितना पसंद था मुझे
अब बिना उलझनों की ज़िन्दगी व्यर्थ लगने लगी है
चलते रहो तभी जिंदा होने का एहसास है
तनहाइयाँ भी डराने लगी हैं
के कहीं अकेला समझ, तरस न खाने लगें लोग
कुछ वक़्त लेकिन, आज खाली बैठ कर
खुद के साथ बिताने की ललक फिर से उठी है
भीड़ में घिर के चलते चलते,
अब रुक कर, बस अपने ही साथ
साँसों की आवाजें सुनने के लिए
फिर से टटोलने लगी हूँ उन्ही फुरसतों को
वही फुरसतें जिनमे प्यार हुआ करता था
बिन बातों के भी रात गुज़र जाती थी बातों बातों में

वो आँसू जो सिर्फ आँखों से टपकते थे
नापती नहीं थी हर कदम चलने से पहले
रुक गए हैं कदम अब, जंग लगी है ज़िन्दगी में
आंसुयों ने भी तो आँखों के रास्ते छोड़ कर
घर कर लिया है मेरे ज़हन में

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Comments
  1. ravichauhan23 says:

    आपकी कविता पढकर खुद को जानने की इच्छा हुई है
    यहाँ हूँ वहाँ हूँ मैं भी कहाँ हूँ खुदा से बना हूँ और खुद मे छुपा हूँ

    • Rijuta says:

      ख़ुद को जानने के लिए निकली थी कभी
      और पाया, ख़ुद को ही बाँधने लगी हूँ मैं
      -ऋजुता

  2. Pawan Jindal says:

    seekhen jo khud ko behtar karne ke liye thin, aaj doosron ki khaamiyaan ginwane ke kaam aa rahi hain—–wah bahoot khoob likha hai. nice expressions, keep going…..

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