महफिल

Posted: October 4, 2013 in Poems
Tags:

1) जाम आज तुझको भी मैंने आज़मा के देख लिया
तु ले रहा था सबका इम्तिहान, मैंने भी संग तेरे ज़माना देख लिया

2) प्याले खुद ही टूटा करते हैं, फितरत ही उसने ऐसी पाई है
ऐसा क्या हुआ, के इलज़ाम तुझको अपने सिर लेना पड़ा

3) आज महफिल का आलम यूँ था
दौर चलते रहे, होश आता रहा

Advertisements
Comments
  1. ravichauhan23 says:

    पीने की हसरत है खुद को मिटाने के लिये या थम जाता है सफर खुद को बचाने के लिये
    आज महफिल मे बदनाम है किसी रुसवाई के लिये या महफिल बदनाम कर रही उस इलजाम के लिये

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s