Archive for November, 2013


1) बाहर कुछ आवाज-सी तो है, पर बातें सुनाई नहीं देती
दिल में जो बातें हैं, बस वही गूंजती हैं कानों में

2) देखा है कुछ लोग दिन-रात दुआएं करते हैं
लगता है वो भी किसी से प्यार करते हैं!

3) बंद आखों से तो तेरे ख्यालों को नकार दें
पलकों के उठते ही ये झूठ भी पकड़ा जाता है

4) ये दर्द भी कुछ अजीब है
होता नहीं जिसे, वो खुद पे तरस खाता है

5) आज मेरे सामने, एक सिर्फ़ मैं ही हूँ
बदगुमानी है मुझे, दुनिया बस यही है

तेरी उम्मीद

Posted: November 23, 2013 in Poems
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कहाँ मुश्किल है तुझसे मुहब्बत करना
खुद को खोने का डर तो है लेकिन
तुझे पाने की उम्मीद क्या कम है
खुद से जुदा होने के लिए

Silence

Posted: November 22, 2013 in Poems
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My silence is confronting me
Now, there’s no word that is coming to rescue

How do I listen to those unspoken things
O, so beautiful!
I am still afraid of getting drowned
Please let me stay afloat,
and send some deafening words
Let me betray my silence once more

Or do one thing,
and rescue me once and forever
Take me to the depths,
that drowning won’t frighten me any more

ये आदत तो नहीं

Posted: November 14, 2013 in Poems
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एक बार सोचा

कहीं ये महज़ आदत तो नहीं

ख्याल आया फिर की जो आदत होती ,

बदल जाती कभी की

यूँ ज़िन्दगी का रुख बदल रही है

हर पल नगमे ये नए बुन रही है

नहीं ये कुछ और ही है

आदतों को आता कहाँ है

नए रास्तों पे चलना

आदतों को आता कहाँ है

किसी के दिल में घर करना

नहीं, ये आदत तो नहीं

ये कुछ और ही है

Thoughts

Posted: November 13, 2013 in Poems
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So severe were those hours
Dissecting all I said and all I did.
Attaching motive to every word I uttered,
Making a demon out of all my deeds.

Morning is again getting beautiful.
With fewer thoughts floating,
of the hours gone by.
Thoughts that at times just spill over.
But thoughts that always are at peril,
of being taken too seriously.

सच और वहम

Posted: November 4, 2013 in Poems
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तेरा सच और मेरा वहम,
दरमियाँ बस मैं और तुम.
फांसले और कुछ भी नही,
एक तेरा ख्याल है,
एक मेरा ख्याल


1) मंदिरों के बग़ैर भी, मेरा गुज़ारा तो मुमकिन है
सिर झुका के गुज़रती हूँ क्योंकि, वहाँ पूजते हैं तुझे सभी

2) ये दुनिया से नाराजगी है तेरी
या ख़ुद के लिए सज़ा मुक़र्रर की है

3) कई बातें मैंने कहानी में रहकर कहीं थी
मेरी ज़िंदगी वो कहानी तो नही

4) आज माफ करदे तू ख़ुद को
के प्यार से देखे फिर, तू मुझको

5) वो माथे की सलवटें हाथों से मिटाना
फिर देखना, हथेली की लकीरें बदली या नही

6) काल की हर परत में वही एक किस्सा
किरदार बदलते रहे, बंदिशें नही

7) ख़ुद को जानने के लिए निकली थी कभी
और पाया, ख़ुद को ही बाँधने लगी हूँ मैं