कुछ ख्याल और थोड़ा सा इश्क

Posted: May 5, 2014 in Poems
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1) मैं ख़ुद की मैय्यत में भीड़ जुटाने को
ज़िंदगी भर अपना जनाज़ा सजाता रहा

2) कफ्न भी ओढ़ लेंगे, ऐसी भी क्या जल्दी है
कुछ देर रुको, नजरों पे पर्दे अभी बाकी हैं

3) सँकरी लगने लगी हैं ये गलियाँ
क्या मेरी दुनिया सिमटने लगी है

4) आंसुयो ने भी क्या कभी तक़्लीफे दी हैं
ये सिक्कों की खनक है, जो सोने नही देती

5) कुछ लकीरों की हेर-फेर, कुछ रंगों का बदलना
एक तस्वीर हर पल ख़ुद-ब-ख़ुद बदलती रही

6) काफिर थे, तब इश्क था
अब सिर्फ इश्क के मायने तलाश्ते हैं

7) तेरी चाँद की बातें, मेरे झिलमिल तारों की रात थी
तेरा मुझपे चाँदनी उड़ेलना, मेरा तुझपे तारे वारना

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Comments
  1. Anurag says:

    लम्बे अंतराल के बाद आपकी रचना को पढ़ने के बाद बहुत अच्छा लग रहा है…मानसिक सुकून की सुखानुभूति का अनुभव नैसर्गिक है.. संवेदनशील लेखन के लिए साधुवाद…..

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