Archive for July, 2014

Clearing Debris Within

Posted: July 27, 2014 in Poems
Tags:

Show me the place,
where I don’t have to fake my identity.
Universe is big, they say.
Then, why can’t it hold me?
Clearing debris within,
making space for a peaceful sleep.

Advertisements

1) सिर्फ़ पत्थर का होता, तो तराश लेते इसे
उलझन तो यही है के कुछ और भी है ये दिल

2) जज़्बातो के परे एक दुनिया है,
वही तो पता है इन दिनों मेरा

3) देह का व्यापार घृणित है
आओ, रूह की नीलामी करें
और, सभ्य हम बन जाएँ

4) वो पन्ना जिसकी नाव बना कर, पानी में तुमने छोड़ा था
शब्द नही बहे थे केवल, अंश मेरा भी उसमें खोया था

5) आसमानो में बैठा मैं, हुक्का गुड़गुड़ा रहा था,
फिर बहा जो आंखों से, धुआँ था या सपना कोई

6) कफ्न का इंतज़ार नही, ए ज़िंदगी!
सिर्फ़ जिंदा नही मैं, जी भी रही हूँ