कुछ और भी है ये दिल

Posted: July 12, 2014 in Poems
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1) सिर्फ़ पत्थर का होता, तो तराश लेते इसे
उलझन तो यही है के कुछ और भी है ये दिल

2) जज़्बातो के परे एक दुनिया है,
वही तो पता है इन दिनों मेरा

3) देह का व्यापार घृणित है
आओ, रूह की नीलामी करें
और, सभ्य हम बन जाएँ

4) वो पन्ना जिसकी नाव बना कर, पानी में तुमने छोड़ा था
शब्द नही बहे थे केवल, अंश मेरा भी उसमें खोया था

5) आसमानो में बैठा मैं, हुक्का गुड़गुड़ा रहा था,
फिर बहा जो आंखों से, धुआँ था या सपना कोई

6) कफ्न का इंतज़ार नही, ए ज़िंदगी!
सिर्फ़ जिंदा नही मैं, जी भी रही हूँ

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Comments
  1. Anurag Sharma says:

    Absolutely amazing.

  2. wrahul31 says:

    Intense. 😮
    Please read my poems on wrahul31.wordpress.com

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