Archive for January, 2015


1. मेरे जनाज़े पे बहाने को तो, आँसू तुने संजो रखे हैं
आ पास बैठ कुछ देर, ज़िंदगी में भी साथ रो लेते हैं

2. कोहरे की सीलन जज़्बातो पर उतरी पड़ी है
तुम कहो तो ख़ुद को जलादें या धूप का इंतज़ार करें

3. अपनी खाली जेब उड़ेल कर, उसने झोली मेरी यूँ भरी
सब कुछ मैं लुटाए जाऊँ, फिर से भर-भर पाऊँ मैं

4. आइनो में धुँधला धुआँ था और धुँधला अक्स भी
चिंगारियाँ जो दफ्न की, न आग हुई ना बुझ सकी

5. अभी मसरूफ हूँ, कुछ देर में आना
ज़िंदगी को भी कहा है मैंने, इंतज़ार करने को

6. वो एक किस्सा, सिर्फ़ तेरा तो नही था
आओ, उसे हिस्सों में बाँट लेते हैं
इस बहाने कुछ वक्त साथ गुज़र जायेगा

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इबादते

Posted: January 9, 2015 in Poems
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  1. इबादते भी तो छुप कर की हैं मैंने,
    के मेरा मज़हब न पहचान ले कोई
  1. ना अवतरित था, ना पाप का जना कोई
    किसी को देवता, किसी को दानव बता दिया
  2. हर कत्ल भी गुनाह तो नहीं होता है
    मेरे रहनुमा से मैंने ही मौत मांगी है

4. अपने से ही जो तुम ख़ौफज़दा हो
कैसे कहो फिर, इश्क गैरों से करोगे