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1) तमाम ज़िंदगी गुज़ारी है जमाने तेरी रवायतो में
आखरी दौर में साथ देने का, क्या तेरे यहाँ रिवाज़ नही है

2) माना मौत में कोई साथ नही जाता
अभी तो लेकिन, मौत का सिर्फ़ इंतज़ार ही था

3) कुछ देर ठहर ज़ख्म नए देने में
घाव पहले के ज़रा ठाप तो लूँ

4) कहाँ तुझसे कोई शिकायत है ज़िंदगी
बस मेरे सामने जब दुःख देती है उसको
कुछ हिम्मत और डांठस भी साथ देती जाना

5) तेरे दर्द को महसूस करूँ कैसे
ना मेरे वो हालात, ना वो जज़्बात हैं मेरे
साथ रहने की, कोशिश भर है

6) आज फिर छेड़े हैं तुमने वो राग
साज़ जिन पर मेरी बलि माँगते हैं

7) ना लिखो तुम ये दास्ताने
लोग उसे ज़िंदगी कहते हैं

8) जब दिल ही ना रहा अपना
तो दिल कि बातें अपनी कैसे होती

9) अपनी ही गिरफ्त में, ख़ुद कि याद छूती नही
इश्क कि वजह तलाशती हूँ, तेरी हो पाती नही

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