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कुछ ख्वाब आते हैं
सोती नहीं कई बार रात रात भर
दिन के उजालों में लेकिन वो
दबे पाँव जाने कैसे छुपते छुपाते
आँखों में न सही
ज़हन में उतर जाते हैं
ये ख्वाब सच न हों डरती हूँ
देख न ले कोई और इन्हें
यही सोच कर नज़रें झुकी रखती हूँ
आँखें कर लूँ बंद
फिर भी कहाँ छुप पाते हैं
कुछ ख्वाब तो आते हैं

ये अगर में हूँ तो
ख्वाबों में है वो कौन
हकीक़त जिसे समझे हैं
कहीं वही भ्रम तो नहीं
वो चेहरा जो जचा नहीं
उसे ख्वाब मान लिया
खवाबों में अब जी रहे हैं
क्या अब किसी को गिला नहीं

कह दो उन ख्वाबों को
उनकी हकीक़त नहीं कुबूल
यूँही छुपे रहे और
किसी से कुछ न कहें वो
हम दुसरे ही ख्वाब में जी रहे हैं
जीने दें हमें
लिबास किसी और का ही सही
पहन लेने दें हमें
कुछ देर के लिए ही तो हम
दुनिया में आये हैं

कुछ देर के लिए ही तो हम
दुनिया में आये हैं
गौर किया नहीं क्यूँ मैंने पहले इस बात पर
कुछ दिन ही तो हैं मेरे पास
औरों के डर ने फिर क्यूँ मुझे डरा दिया
आँखें खुली हैं अब तो देखो
कुछ ख्वाब तो आते ही हैं
झूठी हकीक़तों को धुन्दला कर
मेरे एहसासों पर पड़ी धुल
रुई सी हवा में उड़ा ले जाते हैं