Posts Tagged ‘Life’

शब्दों का जाल

Posted: October 4, 2013 in Poems
Tags: ,

1) हम कहते भी जा रहे हैं और सुनते भी जा रहे
जाल बुन रहा शब्दों का, जकड़े हैं उसमें सभी

2) कोई जब खुश है मेरी बातों में ख़ुद को ढुढ कर
मैंने भी कहाँ हर बात पर, सच कहने की कसम खायी है

3) सवालों पर तो सवाल खड़े हुए हैं
जवाब खामोशियो ने ही छुपा रखे हैं

4) लफ्ज़ों में ढलते-ढलते, जाने कैसे
बातें अक्सर बेमानी हो जाती हैं

5) कहा था कई बार ख़ुद से चुप रहने को
बातों-बातों में कभी सच भी तो निकल जाता है


1) तमाम ज़िंदगी गुज़ारी है जमाने तेरी रवायतो में
आखरी दौर में साथ देने का, क्या तेरे यहाँ रिवाज़ नही है

2) माना मौत में कोई साथ नही जाता
अभी तो लेकिन, मौत का सिर्फ़ इंतज़ार ही था

3) कुछ देर ठहर ज़ख्म नए देने में
घाव पहले के ज़रा ठाप तो लूँ

4) कहाँ तुझसे कोई शिकायत है ज़िंदगी
बस मेरे सामने जब दुःख देती है उसको
कुछ हिम्मत और डांठस भी साथ देती जाना

5) तेरे दर्द को महसूस करूँ कैसे
ना मेरे वो हालात, ना वो जज़्बात हैं मेरे
साथ रहने की, कोशिश भर है

6) आज फिर छेड़े हैं तुमने वो राग
साज़ जिन पर मेरी बलि माँगते हैं

7) ना लिखो तुम ये दास्ताने
लोग उसे ज़िंदगी कहते हैं

8) जब दिल ही ना रहा अपना
तो दिल कि बातें अपनी कैसे होती

9) अपनी ही गिरफ्त में, ख़ुद कि याद छूती नही
इश्क कि वजह तलाशती हूँ, तेरी हो पाती नही


कुछ ख्वाब आते हैं
सोती नहीं कई बार रात रात भर
दिन के उजालों में लेकिन वो
दबे पाँव जाने कैसे छुपते छुपाते
आँखों में न सही
ज़हन में उतर जाते हैं
ये ख्वाब सच न हों डरती हूँ
देख न ले कोई और इन्हें
यही सोच कर नज़रें झुकी रखती हूँ
आँखें कर लूँ बंद
फिर भी कहाँ छुप पाते हैं
कुछ ख्वाब तो आते हैं

ये अगर में हूँ तो
ख्वाबों में है वो कौन
हकीक़त जिसे समझे हैं
कहीं वही भ्रम तो नहीं
वो चेहरा जो जचा नहीं
उसे ख्वाब मान लिया
खवाबों में अब जी रहे हैं
क्या अब किसी को गिला नहीं

कह दो उन ख्वाबों को
उनकी हकीक़त नहीं कुबूल
यूँही छुपे रहे और
किसी से कुछ न कहें वो
हम दुसरे ही ख्वाब में जी रहे हैं
जीने दें हमें
लिबास किसी और का ही सही
पहन लेने दें हमें
कुछ देर के लिए ही तो हम
दुनिया में आये हैं

कुछ देर के लिए ही तो हम
दुनिया में आये हैं
गौर किया नहीं क्यूँ मैंने पहले इस बात पर
कुछ दिन ही तो हैं मेरे पास
औरों के डर ने फिर क्यूँ मुझे डरा दिया
आँखें खुली हैं अब तो देखो
कुछ ख्वाब तो आते ही हैं
झूठी हकीक़तों को धुन्दला कर
मेरे एहसासों पर पड़ी धुल
रुई सी हवा में उड़ा ले जाते हैं

ज़िन्दगी

Posted: February 12, 2012 in Poems
Tags: ,

अपनी ही है ये ज़िन्दगी, ऊधार में तो मिली नहीं
किश्तों में फिर क्यूँ जी रहे, कोई मजबूरी तो नहीं ये ज़िन्दगी
हंस लिए कुछ देर तो, कुछ देर आंसों भी बहाइये
उन आन्सुयों की याद में मगर ,
जो मुस्कुराहटें मिली उन्हें ना भुलाइये