Posts Tagged ‘Thoughts’

Treasure that has Found Peace

Posted: February 22, 2016 in Poems, Thoughts
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Treasures that are now resting in the deeps,
Once there was a time, when they were drowning
Crying; clamouring to hold onto a plank of sinking ship

Cries that could not be heard as they were afar
Struggles were unseen from the land where people lived
Today there’s a hunt for the treasure that has found peace

Benchmark

Posted: October 24, 2015 in Poems
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Be your own benchmark,
And set yourself free
You do not have to look around,
For what you want to be.


1) सिर्फ़ पत्थर का होता, तो तराश लेते इसे
उलझन तो यही है के कुछ और भी है ये दिल

2) जज़्बातो के परे एक दुनिया है,
वही तो पता है इन दिनों मेरा

3) देह का व्यापार घृणित है
आओ, रूह की नीलामी करें
और, सभ्य हम बन जाएँ

4) वो पन्ना जिसकी नाव बना कर, पानी में तुमने छोड़ा था
शब्द नही बहे थे केवल, अंश मेरा भी उसमें खोया था

5) आसमानो में बैठा मैं, हुक्का गुड़गुड़ा रहा था,
फिर बहा जो आंखों से, धुआँ था या सपना कोई

6) कफ्न का इंतज़ार नही, ए ज़िंदगी!
सिर्फ़ जिंदा नही मैं, जी भी रही हूँ

Thoughts

Posted: November 13, 2013 in Poems
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So severe were those hours
Dissecting all I said and all I did.
Attaching motive to every word I uttered,
Making a demon out of all my deeds.

Morning is again getting beautiful.
With fewer thoughts floating,
of the hours gone by.
Thoughts that at times just spill over.
But thoughts that always are at peril,
of being taken too seriously.

सच और वहम

Posted: November 4, 2013 in Poems
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तेरा सच और मेरा वहम,
दरमियाँ बस मैं और तुम.
फांसले और कुछ भी नही,
एक तेरा ख्याल है,
एक मेरा ख्याल


पल-पल में ना आंको मुझे,
हर पल में हूँ बदल रही
तेरा शब्दो में मुझे यूँ तराशना
जैसे बेड़ियों में मुझे है बाँधना
नही फिर से वही बन पाऊँगी
वक्त वो कभी का गुजर गया

ये शोर मेरा नहीं

Posted: January 12, 2013 in Poems
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मैंने तो सुरीली तानों से मंच सजाया था

जल तरंग की मृदुल ध्वनि को साँसों में बसाया था

तार वीणा के थिरकने थे मेरे ह्रदय में

नाचूं सब भूल के मैं, गीत ऐसा रचाया था।।

गीत के बोलों को किसने बिखेरा है

जल वीणा के तारों पे किसने उडेला है

आज थिरकन भी प्रलय का नाच नाचती

सुरों के तार खींच-खींच, बिजलियों से बांधती

कहती है गाओ मुझे, मैं गीत तेरा हूँ

झूम लो इन जंगलों में, ये नाच तेरा हूँ

तूने जिसे सजाया, मैं वो राग तेरा हूँ।।

तुम छोड़ दो मुझको मेरे ही आस-पास

सुरों को फिर ज़रा पिरो लूँ मैं

मन के जल-तरंग पे खून जो लगा है

धीरे-से ज़रा उसको भी धो लूँ मैं

नहीं ये शोर मेरा नहीं, रोज़ जीना है मुझे

कुछ पल दो मुझे, एक गीत नया बुन लूँ मैं।।